बस ऐसे ही TS के बाद बैठे बैठे मन किया और जो आता गया, मैं लिखता गया ! कोई गूढ़ अर्थ न निकालें इस कविता का ! कुछ अच्छा निकल जाए तो भी अच्छी बात है :) ध्यान से देखें तो कुछ समसामयिक घटनाओं का उल्लेख है, परन्तु न्यून है !
इस रंग त्यागती दुनिया में
कैसे रंग भरूँ
बस लाल रंग व्याप्त है
आख़िर क्या करूँ ?
व्यथित हूँ, दुखित हूँ
चाहे कितना उदित हूँ
कहने को महान हूँ
अंतर्मन से पतित हूँ
सभ्य बन गया हूँ
समाज के लायक हो गया हूँ
परन्तु अंतर्मन में
ख़ुद के लिए खलनायक हो गया हूँ
हर तरफ़ बर्बादी है
हर तरफ़ हताशा देखता हूँ
मूक बनके, बधिर बन,
बस तमाशा देखता हूँ
मुझे परवाह नहीं
किसी का घर जले, किसे फिकर है
पर फ़िर भी हाल चाल पूछता हूँ उसका
क्योंकि कमाई उधर है, ख़बर जिधर है
अपनी खुशी चाहता हूँ बस
कई हथकंडे अपनाता हूँ
कभी राजनीति करता हूँ
कभी छेत्रवाद को गले लगाता हूँ !
गलियाता हूँ अमरीका को
पर ख़ुद पर नियंत्रण है नहीं
पैसे पैसे के लिए इतना क्लेश
इसका उपाय है कहीं ?
शेयर बाज़ार पे ध्यान है पूरा
सारी ख़बर रखता हूँ
पर प्रेम की पूँजी लगाकर माँ की बनाई खीर
चैन से कब चखता हूँ ?
सब पाने की चाह में
स्वयं को खो चुका हूँ
केवल शरीर मूर्त है,
आत्मा से सो चुका हूँ !
नहीं लुभाती अब वो खाली शामें
वो दोस्तों के साथ घंटों चलती निरर्थक बातें
केवल मशीन बनकर रह गया हूँ
बची हैं सिर्फ़ ये निद्राविहीन रातें !
समय नहीं है
अपने प्रभु को आवाज लगाने का
ताकि करूँ कुछ उपाय
अपनी इंसानियत बचाने का
थक गया हूँ पर,
विश्राम नहीं कर सकता
सिर्फ़ प्रभु की भक्ति से
परिवार का पेट नहीं भर सकता
जानता हूँ गलती हुई है
पर ख़ुद को एहसास नहीं कराना है
दुनिया की दौड़ में आख़िर
सबको जो हराना है
यही एक तरीका है
ज़िन्दगी जीते जाने का
इंसानियत का बहाना छोड़
हर असफलता को हराने का
कुछ पाने का, कुछ कर दिखाने का !
Tuesday, October 21, 2008
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6 comments:
totally awesome yaar....even I felt many similar thngs but cld nvr articulate dem. :)
Padh kar maza aaya.
obbbey
ultimate hai
very apt
Oji thanku hai ji !
good hai sandeep ji...
totally awesome......
I also feel the same...
shanadaaaaaaaaaaaar
really aisa lagta hai ki meri feelings ko aawaz mil gayi hai
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