साधारण पथ का साधारण पथिक,
सुख में उन्मादित, दुःख में व्यथित,
द्वेष रहित, प्रेम सहित, मनमौजी कथित...
कुछ ऐसा है मेरा परिचय, पर चर्चा का यह नहीं विषय...
विषय है यह कि कौन हूँ मैं, क्यों पहचान पे अपनी मौन हूँ मैं...
अब पाठक ही निर्णायक हो, कैसा मेरा परिचायक हो...
अमुक स्थान के अमुक शहर या अमुक गाँव का वासी हूँ,
दिल्ली वाला, मुम्बईया, बंगाली या मद्रासी हूँ...
क्यों इस मद बाबत अंतर हो, क्यों पहचानों का जंतर हो...
द्वेष मिटा के प्रेम करो, क्रोध हटा के धीर धरो...
फिर आ जाना शांति के पथ पर, मेरा है छोटा सा एक घर...
फिर साथ करेंगे शेष सफ़र, साधारण पथ के साधारण पथिक बनकर...
Tuesday, February 9, 2010
Tuesday, October 21, 2008
विचारावेग...
बस ऐसे ही TS के बाद बैठे बैठे मन किया और जो आता गया, मैं लिखता गया ! कोई गूढ़ अर्थ न निकालें इस कविता का ! कुछ अच्छा निकल जाए तो भी अच्छी बात है :) ध्यान से देखें तो कुछ समसामयिक घटनाओं का उल्लेख है, परन्तु न्यून है !
इस रंग त्यागती दुनिया में
कैसे रंग भरूँ
बस लाल रंग व्याप्त है
आख़िर क्या करूँ ?
व्यथित हूँ, दुखित हूँ
चाहे कितना उदित हूँ
कहने को महान हूँ
अंतर्मन से पतित हूँ
सभ्य बन गया हूँ
समाज के लायक हो गया हूँ
परन्तु अंतर्मन में
ख़ुद के लिए खलनायक हो गया हूँ
हर तरफ़ बर्बादी है
हर तरफ़ हताशा देखता हूँ
मूक बनके, बधिर बन,
बस तमाशा देखता हूँ
मुझे परवाह नहीं
किसी का घर जले, किसे फिकर है
पर फ़िर भी हाल चाल पूछता हूँ उसका
क्योंकि कमाई उधर है, ख़बर जिधर है
अपनी खुशी चाहता हूँ बस
कई हथकंडे अपनाता हूँ
कभी राजनीति करता हूँ
कभी छेत्रवाद को गले लगाता हूँ !
गलियाता हूँ अमरीका को
पर ख़ुद पर नियंत्रण है नहीं
पैसे पैसे के लिए इतना क्लेश
इसका उपाय है कहीं ?
शेयर बाज़ार पे ध्यान है पूरा
सारी ख़बर रखता हूँ
पर प्रेम की पूँजी लगाकर माँ की बनाई खीर
चैन से कब चखता हूँ ?
सब पाने की चाह में
स्वयं को खो चुका हूँ
केवल शरीर मूर्त है,
आत्मा से सो चुका हूँ !
नहीं लुभाती अब वो खाली शामें
वो दोस्तों के साथ घंटों चलती निरर्थक बातें
केवल मशीन बनकर रह गया हूँ
बची हैं सिर्फ़ ये निद्राविहीन रातें !
समय नहीं है
अपने प्रभु को आवाज लगाने का
ताकि करूँ कुछ उपाय
अपनी इंसानियत बचाने का
थक गया हूँ पर,
विश्राम नहीं कर सकता
सिर्फ़ प्रभु की भक्ति से
परिवार का पेट नहीं भर सकता
जानता हूँ गलती हुई है
पर ख़ुद को एहसास नहीं कराना है
दुनिया की दौड़ में आख़िर
सबको जो हराना है
यही एक तरीका है
ज़िन्दगी जीते जाने का
इंसानियत का बहाना छोड़
हर असफलता को हराने का
कुछ पाने का, कुछ कर दिखाने का !
इस रंग त्यागती दुनिया में
कैसे रंग भरूँ
बस लाल रंग व्याप्त है
आख़िर क्या करूँ ?
व्यथित हूँ, दुखित हूँ
चाहे कितना उदित हूँ
कहने को महान हूँ
अंतर्मन से पतित हूँ
सभ्य बन गया हूँ
समाज के लायक हो गया हूँ
परन्तु अंतर्मन में
ख़ुद के लिए खलनायक हो गया हूँ
हर तरफ़ बर्बादी है
हर तरफ़ हताशा देखता हूँ
मूक बनके, बधिर बन,
बस तमाशा देखता हूँ
मुझे परवाह नहीं
किसी का घर जले, किसे फिकर है
पर फ़िर भी हाल चाल पूछता हूँ उसका
क्योंकि कमाई उधर है, ख़बर जिधर है
अपनी खुशी चाहता हूँ बस
कई हथकंडे अपनाता हूँ
कभी राजनीति करता हूँ
कभी छेत्रवाद को गले लगाता हूँ !
गलियाता हूँ अमरीका को
पर ख़ुद पर नियंत्रण है नहीं
पैसे पैसे के लिए इतना क्लेश
इसका उपाय है कहीं ?
शेयर बाज़ार पे ध्यान है पूरा
सारी ख़बर रखता हूँ
पर प्रेम की पूँजी लगाकर माँ की बनाई खीर
चैन से कब चखता हूँ ?
सब पाने की चाह में
स्वयं को खो चुका हूँ
केवल शरीर मूर्त है,
आत्मा से सो चुका हूँ !
नहीं लुभाती अब वो खाली शामें
वो दोस्तों के साथ घंटों चलती निरर्थक बातें
केवल मशीन बनकर रह गया हूँ
बची हैं सिर्फ़ ये निद्राविहीन रातें !
समय नहीं है
अपने प्रभु को आवाज लगाने का
ताकि करूँ कुछ उपाय
अपनी इंसानियत बचाने का
थक गया हूँ पर,
विश्राम नहीं कर सकता
सिर्फ़ प्रभु की भक्ति से
परिवार का पेट नहीं भर सकता
जानता हूँ गलती हुई है
पर ख़ुद को एहसास नहीं कराना है
दुनिया की दौड़ में आख़िर
सबको जो हराना है
यही एक तरीका है
ज़िन्दगी जीते जाने का
इंसानियत का बहाना छोड़
हर असफलता को हराने का
कुछ पाने का, कुछ कर दिखाने का !
Sunday, October 21, 2007
मैं गीत नया गाता हूँ ( स्कूल की यादें) ...
यह कविता मैंने अपने विद्यालय में दसवीं कक्षा के farewell function में अपनी प्रधानाचार्या श्रीमती कृष्ण यादव के लिए सुनाई थी। उनके साथ मेरे संबंध कुछ जयादा ही घनिष्ठ थे, जो कि इस कविता में स्पष्ट हो जाएगा। मेरी कविता ने मैडम को इस हद तक प्रभावित किया कि अगले तीन साल तक farewell के दौरान खाना पीना छोड़ कर कुछ और करने की इजाजत नहीं दी गयी। :D
चौथी क्लास में जब मैं आया, सहमा सहमा रहता था।
जो भी मुझसे पूछा करता, उससे मैं यही कहता था॥
बाल तिरंगे पतला तन, सांवली सूरत कृष्णा मैडम।
साफ स्वच्छ मन, ममतामयी, दया की मूरत कृष्णा मैडम॥
कभी भी पूछे जाने पर, यही कहे जाता था,
मैं गीत वही गाता था...
बड़े बच्चों से पूछा करता, भैया, मैडम से डर कर क्यों रहते हो ?
हर वक़्त उन्हें चलता फिरता, जिंदा हिटलर क्यों कहते हो ?
वो कहते - बच्चे, बड़े हो कर सब बात पता चल जायेगी।
जागते ही नहीं, सोते हुए भी वही हिटलर नजर आएगी॥
मैं इन पहेलियों को, समझ नहीं पाता था,
मैं गीत वही गाता था...
५ वीं , छठी, ७ वीं ८ वीं का समय आराम से बीता।
कभी कभी कुछ करके, मैडम का मन भी जीता॥
कुछ मौक़े आये, खुद भी पिटा, दूसरों को भी पिटते देखा।
क्या पीट कर ही बदल जायेगी बच्चों की हस्तरेखा ?
मैडम के डंडे से टूटे मेरे भी कोमल हाथ थे।
पर गम न था क्योंकि क्लास के सभी बच्चे मेरे साथ थे॥
पर फिर भी अपनी धारणा बदल नहीं पाता था,
मैं गीत वही गाता था...
नवीं क्लास में अपना हाल कुछ ऐसा था।
क्या बताऊँ, बिल्कुल बलि के बकरे जैसा था॥
मैडम ने कभी भी न हमको था छोड़ा।
आगे से पीछे, ऊपर से नीचे, हमें खूब तोड़ा॥
फिर बहुत हो गया अपनी धारणा पर ठहर नहीं पाता था,
मैं गीत नहीं गाता था...
दसवीं कक्षा में अपनी हालत कुछ ऐसी थी।
शुरू से अंत तक बिल्कुल ऐसी की तैसी थी॥
मैडम ने पिटाई छोड़ी, पर पूरी करनी थी कसर।
A से B में, B से A में कराया ट्रान्सफर॥
बस एक ही बार मैडम का प्रसाद मिला था।
न जाने कितने बरसों बाद मिला था॥
सत्संग में जाकर मैडम बन गयी भली।
जैसे १०० चूहे खाकर बिल्ली हज को चली॥
याद रखें आप भी, इसलिए बता जाता हूँ।
मैं गीत नया गाता हूँ, मैं गीत नया गाता हूँ॥
**********************************
चौथी क्लास में जब मैं आया, सहमा सहमा रहता था।
जो भी मुझसे पूछा करता, उससे मैं यही कहता था॥
बाल तिरंगे पतला तन, सांवली सूरत कृष्णा मैडम।
साफ स्वच्छ मन, ममतामयी, दया की मूरत कृष्णा मैडम॥
कभी भी पूछे जाने पर, यही कहे जाता था,
मैं गीत वही गाता था...
बड़े बच्चों से पूछा करता, भैया, मैडम से डर कर क्यों रहते हो ?
हर वक़्त उन्हें चलता फिरता, जिंदा हिटलर क्यों कहते हो ?
वो कहते - बच्चे, बड़े हो कर सब बात पता चल जायेगी।
जागते ही नहीं, सोते हुए भी वही हिटलर नजर आएगी॥
मैं इन पहेलियों को, समझ नहीं पाता था,
मैं गीत वही गाता था...
५ वीं , छठी, ७ वीं ८ वीं का समय आराम से बीता।
कभी कभी कुछ करके, मैडम का मन भी जीता॥
कुछ मौक़े आये, खुद भी पिटा, दूसरों को भी पिटते देखा।
क्या पीट कर ही बदल जायेगी बच्चों की हस्तरेखा ?
मैडम के डंडे से टूटे मेरे भी कोमल हाथ थे।
पर गम न था क्योंकि क्लास के सभी बच्चे मेरे साथ थे॥
पर फिर भी अपनी धारणा बदल नहीं पाता था,
मैं गीत वही गाता था...
नवीं क्लास में अपना हाल कुछ ऐसा था।
क्या बताऊँ, बिल्कुल बलि के बकरे जैसा था॥
मैडम ने कभी भी न हमको था छोड़ा।
आगे से पीछे, ऊपर से नीचे, हमें खूब तोड़ा॥
फिर बहुत हो गया अपनी धारणा पर ठहर नहीं पाता था,
मैं गीत नहीं गाता था...
दसवीं कक्षा में अपनी हालत कुछ ऐसी थी।
शुरू से अंत तक बिल्कुल ऐसी की तैसी थी॥
मैडम ने पिटाई छोड़ी, पर पूरी करनी थी कसर।
A से B में, B से A में कराया ट्रान्सफर॥
बस एक ही बार मैडम का प्रसाद मिला था।
न जाने कितने बरसों बाद मिला था॥
सत्संग में जाकर मैडम बन गयी भली।
जैसे १०० चूहे खाकर बिल्ली हज को चली॥
याद रखें आप भी, इसलिए बता जाता हूँ।
मैं गीत नया गाता हूँ, मैं गीत नया गाता हूँ॥
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Monday, October 15, 2007
रूड़की चालीसा (चौबीसा)
जनता जनार्दन के अनुरोध पर मेरी तरफ से सबको एक छोटी सी भेंट ........ :)यह कविता मैंने अधिस्नातक प्रथम वर्ष में अपने भवन दिवस पर सुनाई थी। विषयवस्तु की बात करें तो मैंने इसमें प्रथम वर्ष के प्रायः सभी अनुभव इसमें दर्शाने की कोशिश की है। अगर इसके कुछ शब्द अथवा प्रसंग किसी पाठक की समझ में ना आयें तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। इन्हें समझने के लिए आपको IIT रूड़की की भाषा से अवगत होना पड़ेगा। :) पहले ही बता दूं कि चालीसा होते हुए भी इसमें चौबीस ही छन्द हैं। नाम में क्या रखा है ? भावनाओं को देखिए ! 
जय रूड़की जय ज्ञान का सागर ।
तुम ही अमावस तुम ही प्रभाकर ॥
लक्ष्य हमारा बस इतना सा ।
फटके ना कोई भी अपने पासा ॥
हम तो सदा ही अव्वल आवें ।
पर किस क्षेत्र में कैसे बतावें ॥
विषय नहीं यह समझाने का ।
समय नहीं यह बतलाने का ॥
आरम्भ करें हम प्रथम दिवस से ।
रूड़की पहुंचे थे हम बस से ॥
गए सारे सपने धरे धराए ।
यह कैसे जंगल में आये ॥
अगला ही दिन आया भयंकर ।
हर विभाग में मारे चक्कर ॥
समय तालिका समझ ना आना ।
विभागों में भगदौड़ मचाना ॥
शाम को फिर जब कमरे में आये ।
NCC प्रभुदेव बुलाये ॥
दिन भर थक कर वापस आना ।
NCC में सर मुन्ड्वाना ॥
प्रकट हुई एक और मज़बूरी । ................................................//रैगिंग :D
सीनीयर्स की हुई इच्छा पूरी ॥
हर बन्दे का यह था कहना ।
नेस्की से तो दूर ही रहना ॥
खैर समय बीता सब चंगा ।
खुद को यहाँ के रंग में रंगा ॥
बोरिअत का जो भी हो मारा ।
CL ही था एक सहारा ॥ .................................................//सिविल लाइंस
पढ़ने का समय नहीं बच पाना ।
मेस का खाना नहीं पच पाना ॥
था आवश्यक सबने जाना ।
अस्पताल का लाभ उठाना ॥
फिर आगे कई सेक्शन आये ।
interview conduct कराए ॥
चापो मिलना नाचना गाना । ........................//chaapo means partyyyyy
जिंदगी का पटरी पर आना ॥
बकर चैट रतजग्गा Bus T ।
इनमें ही बसती है मस्ती ॥
lovers प्वाइंट जो देखा जाये ।
कोई कितनी जगह बताये ॥
वो तैंतीस हम पाच सौ तैंतीस । ...//the frustating sex ratio in IITs :X
कोई देवी मिले हर भक्त की कोशिश ॥
library, नेस्की, सरोजिनी भवना । ..............//the only gals' hostel then
दें प्रेमी सब यहीं पे धरना ॥
पढ़ाई घिसाई क्यों बीच में लावें ।
सबको पता है किसे बतावें ॥
lecture सुनने वाले सब रोयें ।
खुश हैं वही जो क्लास में सोयें ॥ //something about me and melikes :)
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
मेरा एक ही सार है, IITR महान
पढने जो भी आये यहाँ पर, बने देश की शान ॥
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
©संदीप मिश्रा

जय रूड़की जय ज्ञान का सागर ।
तुम ही अमावस तुम ही प्रभाकर ॥
लक्ष्य हमारा बस इतना सा ।
फटके ना कोई भी अपने पासा ॥
हम तो सदा ही अव्वल आवें ।
पर किस क्षेत्र में कैसे बतावें ॥
विषय नहीं यह समझाने का ।
समय नहीं यह बतलाने का ॥
आरम्भ करें हम प्रथम दिवस से ।
रूड़की पहुंचे थे हम बस से ॥
गए सारे सपने धरे धराए ।
यह कैसे जंगल में आये ॥
अगला ही दिन आया भयंकर ।
हर विभाग में मारे चक्कर ॥
समय तालिका समझ ना आना ।
विभागों में भगदौड़ मचाना ॥
शाम को फिर जब कमरे में आये ।
NCC प्रभुदेव बुलाये ॥
दिन भर थक कर वापस आना ।
NCC में सर मुन्ड्वाना ॥
प्रकट हुई एक और मज़बूरी । ................................................//रैगिंग :D
सीनीयर्स की हुई इच्छा पूरी ॥
हर बन्दे का यह था कहना ।
नेस्की से तो दूर ही रहना ॥
खैर समय बीता सब चंगा ।
खुद को यहाँ के रंग में रंगा ॥
बोरिअत का जो भी हो मारा ।
CL ही था एक सहारा ॥ .................................................//सिविल लाइंस
पढ़ने का समय नहीं बच पाना ।
मेस का खाना नहीं पच पाना ॥
था आवश्यक सबने जाना ।
अस्पताल का लाभ उठाना ॥
फिर आगे कई सेक्शन आये ।
interview conduct कराए ॥
चापो मिलना नाचना गाना । ........................//chaapo means partyyyyy
जिंदगी का पटरी पर आना ॥
बकर चैट रतजग्गा Bus T ।
इनमें ही बसती है मस्ती ॥
lovers प्वाइंट जो देखा जाये ।
कोई कितनी जगह बताये ॥
वो तैंतीस हम पाच सौ तैंतीस । ...//the frustating sex ratio in IITs :X
कोई देवी मिले हर भक्त की कोशिश ॥
library, नेस्की, सरोजिनी भवना । ..............//the only gals' hostel then
दें प्रेमी सब यहीं पे धरना ॥
पढ़ाई घिसाई क्यों बीच में लावें ।
सबको पता है किसे बतावें ॥
lecture सुनने वाले सब रोयें ।
खुश हैं वही जो क्लास में सोयें ॥ //something about me and melikes :)
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मेरा एक ही सार है, IITR महान
पढने जो भी आये यहाँ पर, बने देश की शान ॥
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©संदीप मिश्रा
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