यह कविता मैंने अपने विद्यालय में दसवीं कक्षा के farewell function में अपनी प्रधानाचार्या श्रीमती कृष्ण यादव के लिए सुनाई थी। उनके साथ मेरे संबंध कुछ जयादा ही घनिष्ठ थे, जो कि इस कविता में स्पष्ट हो जाएगा। मेरी कविता ने मैडम को इस हद तक प्रभावित किया कि अगले तीन साल तक farewell के दौरान खाना पीना छोड़ कर कुछ और करने की इजाजत नहीं दी गयी। :D
चौथी क्लास में जब मैं आया, सहमा सहमा रहता था।
जो भी मुझसे पूछा करता, उससे मैं यही कहता था॥
बाल तिरंगे पतला तन, सांवली सूरत कृष्णा मैडम।
साफ स्वच्छ मन, ममतामयी, दया की मूरत कृष्णा मैडम॥
कभी भी पूछे जाने पर, यही कहे जाता था,
मैं गीत वही गाता था...
बड़े बच्चों से पूछा करता, भैया, मैडम से डर कर क्यों रहते हो ?
हर वक़्त उन्हें चलता फिरता, जिंदा हिटलर क्यों कहते हो ?
वो कहते - बच्चे, बड़े हो कर सब बात पता चल जायेगी।
जागते ही नहीं, सोते हुए भी वही हिटलर नजर आएगी॥
मैं इन पहेलियों को, समझ नहीं पाता था,
मैं गीत वही गाता था...
५ वीं , छठी, ७ वीं ८ वीं का समय आराम से बीता।
कभी कभी कुछ करके, मैडम का मन भी जीता॥
कुछ मौक़े आये, खुद भी पिटा, दूसरों को भी पिटते देखा।
क्या पीट कर ही बदल जायेगी बच्चों की हस्तरेखा ?
मैडम के डंडे से टूटे मेरे भी कोमल हाथ थे।
पर गम न था क्योंकि क्लास के सभी बच्चे मेरे साथ थे॥
पर फिर भी अपनी धारणा बदल नहीं पाता था,
मैं गीत वही गाता था...
नवीं क्लास में अपना हाल कुछ ऐसा था।
क्या बताऊँ, बिल्कुल बलि के बकरे जैसा था॥
मैडम ने कभी भी न हमको था छोड़ा।
आगे से पीछे, ऊपर से नीचे, हमें खूब तोड़ा॥
फिर बहुत हो गया अपनी धारणा पर ठहर नहीं पाता था,
मैं गीत नहीं गाता था...
दसवीं कक्षा में अपनी हालत कुछ ऐसी थी।
शुरू से अंत तक बिल्कुल ऐसी की तैसी थी॥
मैडम ने पिटाई छोड़ी, पर पूरी करनी थी कसर।
A से B में, B से A में कराया ट्रान्सफर॥
बस एक ही बार मैडम का प्रसाद मिला था।
न जाने कितने बरसों बाद मिला था॥
सत्संग में जाकर मैडम बन गयी भली।
जैसे १०० चूहे खाकर बिल्ली हज को चली॥
याद रखें आप भी, इसलिए बता जाता हूँ।
मैं गीत नया गाता हूँ, मैं गीत नया गाता हूँ॥
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Sunday, October 21, 2007
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5 comments:
i have been searching for this poem for so many years. That day we had so much fun. I didnt knew that a poem , auhtored by the likes of pundit mishra ji, was going to be there, so it was quite a surprise. Everyone( this includes student only) was barely able to hold their laughter as the words were too true. Sometimes i wish those days would return.
thanx Nimmi, that poem will never leave me. Even now when i get to go thr for my sis, m asked whether it was a poem by me only or some hindi teacher helped me out ! :D
maaf kariyega ye post main bahut hi late padh raha hoon..... parantu bina comment kiye raha nahi jayega... padh ke maza aa gaya....
mishra ji.......tussi toh chhaa gye....wo din yaar i wish if dat day cud cm again......
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